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Library > प्रभु भक्ति
श्री शांतिनाथ जिन पूजा(कवि श्री बख्तावटसिंह)

या भव-कानन में चतुरानन, पाप-पनानन घेरि हमेरी।
आतम-जानन मानन ठानन, बान न होन द इ सठ मेरी।।
तामद भानन आपहि हो, यह छान न आन न आनन टेरी।
आन गही शरनागत को, अब श्रीपतजी पत राखहु मेरी।।

विसर्जन पाठ

बिन जाने वा जान के, रही टूट जो कोय।
तुम प्रसाद तें परम गुरु, सो सब पूरन होय।।
पूजन विधि जानूँ नहीं, नहिं जानूँ आह्वान।
और विसर्जन हूँ नहीं, क्षमा करो भगवान।।

शांति पाठ (हिन्दी)

शांतिनाथ ! मुख शशि-उनहारी, शील-गुण-व्रत, संयमधारी।
लखन एकसौ-आठ विराजें, निरखत नयन-कमल-दल लाजें।।
पंचम-चक्रवर्ति-पदधारी, सोलम-तीर्थकर सुखकारी।
इन्द्र-नरेन्द्र-पूज्य जिननायक, नमो! शांतिहित शांतिविधायक।।


दिव्य विटप पहुपन की बरघा, दुंदुभि आसन वाणी सरसा।
छत्र चमर भामंडल भारी, ये तुव प्रातिहार्य मनहारी।।
शांति ...

महा अर्ध्य

मैं देव श्री अरहंत पूजूँ, सिद्ध पूजूँ चाव सों।
आचार्य श्री उवझाय पूजूँ, साथु पू्जूँ भाव सों ।।
अरहंत भाषित वैन पूजूँ, द्वादशांग रचे गनी।
पूर्जूँ दिगम्बर गुरुचरण, शिवहेत सब आशा हनी।

अर्धावली

शुचि निर्मल नीर गंध सुअक्षत, पुष्प चरु ले मन हर्षाय,
दीप धुप फल अर्घ सुलेकर, नाचत ताल मृदंग बजाय।
श्री आदिनाथ के चरण कमल पर बलि बलि जाऊ मन वच काय,
हे करुणानिधि भव दुःख मेटो, याते मैं पूजों प्रभु पाय॥

श्री सिद्ध पूजन

चिदानंद स्वातम रसी, सत शिव सुंदर जान।
ज्ञाता दृष्टा लोक के, परम सिद्ध भगवान।।
ॐ ह्वीं श्री सिद्धचकराधिपतये सिद्ध परमेष्ठिने अत्र अवतर अवतरसंवौषट।
ॐ हीं श्री सिद्धचकराधिपतये सिद्ध परमेष्ठिने अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।

श्री विद्यमान विंशति तीर्थंकर पूजन

(दोहा)
दीप अढ़ाई मेरु पन, अरु तीर्थकर बीस।
तिन सबकी पूजा करुं, मन-वच-तन धरि शीस॥
ॐ ह्वीं श्री विद्यमान विशति-तीर्थकराः! अत्र अवतर अवतर संवौषद्।
ॐ हीं विद्यमान विशति-तीर्थकरा :! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः|

श्री चौबीस तिर्थंकर पूजा

ऋषभ अजित संभव अभिनंदन, सुमति पदम सुपार्श्व जिनराय।
चंद पुहुप शीतल श्रेयांस-जिन, वासुपूज्य पूजित-सुरराय।
विमल अनंत धरम जस-उज्ज्वल, शांति कुंथु अर मल्लि मनाय।
मुनिसुव्रत नमि नेमि पार्श्वप्रभु, वर्द्धमान पद-पुष्प चढ़ाय।।

समुच्चय पूजन

देवशास्त्र गुरु नमन करि, बीस तीर्थङ्कर ध्याय।
सिद्ध शुद्ध राजत सदा, नर्मूँ चित्त हुलसाय॥
ॐ ह्ीं श्री देवशास्त्र गुरु भगवन्तः, श्री अनंतानंत सिद्ध परमेष्िन:, श्री
विद्यमान विंशति तीर्थकरेभ्यः अत्र अवतरत अवतरत संवौषट्।

देव-शास्त्र- गुरु पूजन कविश्री युगल ...

केवल-रवि-किरणों से जिसका, सम्पूर्ण प्रकाशित है अंतर।
उस श्री जिनवाणी में होता, तत्वों का सुन्दरतम दर्शन॥।
सद्दर्शन-बोथ-चरण-पथ पर, अविरल जो बढ़ते हैं मुनिगण।
उन देव-परम-आगम गुरु को, शत-शत वंदन शत-शत वंदन