पार्श्वनाथ भगवान की जीवन-यात्रा को करुणा और संयम के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। वाराणसी में जन्मे 23वें तीर्थंकर ने राजसी वैभव त्यागकर तप और ध्यान को अपनाया। उनकी सबसे प्रसिद्ध कथा जलती लकड़ी से सर्प को बचाने की है, जो जैन करुणा का प्रतीक बनी। अंततः शिखरजी पर मोक्ष प्राप्त कर वे अहिंसा, चार व्रतो...
भगवान नेमिनाथ जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर थे, जिनका जन्म शौरीपुर में हुआ और वे श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे। विवाह-मंडप जाते समय बाड़े में बंद पशुओं की करुण चीख सुनकर उनके मन में तत्काल वैराग्य उत्पन्न हो गया और उन्होंने सारी बारात वहीं छोड़ दी।