आदिनाथ प्रभु हर रूप में मिल जाते हैं, मौन, आहट या मुस्कान में। जीवन कर्मों की खेती है, जो बोएगा वही काटेगा। नेकी बाँटने वाला स्वयं भी सुगंधित होता है। सच्चा तीर्थ बाहर नहीं, भीतर की श्रद्धा और साधना में है।
पर्युषण का सार है आत्मशुद्धि और क्षमा। क्षमावाणी में हम अपने द्वारा किए गए दोषों और अपराधों के लिए क्षमा माँगते हैं। यह अहिंसा, करुणा और समता का अभ्यास है, जो आत्मा को हल्का करता है। संदेश यही है, क्षमा से ही क्रोध, द्वेष और कर्मबंधन का अंत होता है।