चरण कमल नमी वीरनां रे, पूछे श्रेणिकराय रे, मुनिशुं मन
मान्यो ...
चउद सहस मुनि ताहरे रे, अधिको कोण कहेवाय रे, मुनिशुं
मन मान्यो ... १
जिन कहे अधिको माहरे रे, धन धन्नो अणगार रे, मुनिशुं मन
मान्यो ...
रिद्धि छती जेणे प्रिहारी रे, तजी तरुणी परिवार रे, मुनिशुं मन
मान्यो ... २
सिंह तणी पेरे नीकळी रे, पाळे व्रत सिंह समान रे, मुनिशुं मन
मान्यो ...
क्रोध लोभ माया तजी रे, दुर कर्यो अभिमान रे, मुनिशुं मन
मान्यो ... ३
मुज हाथे संयम ग्रही रे, पाळे निरतिचार रे, मुनिशुं मन मान्यो ...
छट्ठ छट्ठ आंबिल पारणे रे, लीये नीरस आहार रे, मुनिशुं मन
मान्यो ... ४
वंछे न कोई मानवी रे, तेवो लीये आहार रे, मुनिशुं मन मान्यो ...
चालतां हाड खडखडे रे, जेम खाखराना पान रे, मुनिशुं मन
मान्यो ... ५
शकट भर्यु जेम कोयले रे, तिम धन्ना मुनिनुं वान रे, मुनिशुं मन
मान्यो ...
पंच समिति त्रण गुप्तिशुं रे, रंगे रमे निशदिन रे, मुनिशुं मन
मान्यो ... ६
सर्वार्थसिद्ध सुख पामीयो रे, धन धन्नो अणगार रे, मुनिशुं मन मान्यो ...
नवमे अंगे जेहनो रे, वीरे कह्यो अधिकार रे, मुनिशुं मन मान्यो ... ७
पंडित जिनविजय तणो रे, नमे तेहने वारंवार रे, मुनिशुं मन मान्यो ...
प्रातः उठीने तेहनुं रे, नाम लीजे सुविचार रे, मुनिशुं मन मान्यो ... ८


