अब जो फिर से पर्युषण आये हैं
केसर केसर और गुलाबी जहाँ महकाये हैं
मेघ धरा पर, रिमझिम रिमझिम
घिर घिर घिर घिर, घिर घिर आये हैं
जैसे पतझड़ में, कलियाँ आयी
आँधी में दी, नाव दिखाई
जैसे किसी भूले ने रस्ता पाया
जैसे कहीं वर्षों पुराना कोई साथी
फिर इक बार हो, मिलने हो आया
फिर से तपस्या की, लड़ियाँ लगेंगी
कर्मों की फिर से, कड़ियाँ कटेंगी
दिल से दिल की, बात छिड़ेंगी
ऐसा पर्व जो क्षमा सिखलाये
सत्य अहिंसा का, बिगुल बजाये
जीव दया, करुणा समझाये
पल पल, हर पल
नीर सा बहता-कल कल कल कल
घुँघरू सा बाजे -छन छन छन छन
जग सारा केसर केसर महके
तीनों लोक में खुशियाँ छेहके
मन मेरा बहके जोर से कहके
पर्युषण फिर लौट के आये हैं- जगमग जगमग
चारों दिशाएँ दुल्हन सी लगे-सुन्दर सुन्दर
शाख़ से पेड़ों का रंग खिला हो जैसे
सुख की कोई लहर उठी हो जैसे,
घने अँधेरों सी, रात मिटी हो जैसे
चाँद ज़मीन पर आकर बिखरा
सूरज जैसे और हो निखरा
जैसे किसी पंछी ने पहली बार उड़ान लगाई
पर्युषण की जो घड़ियाँ आई,
ऐसा लगे जैसे फिर जान में जान आई
दिल में फिर से उमंगें छाई
ज़ख्मों ने जैसे फिर राहत पाई
भावों भावों से भटक रहे थे
आत्मा शांति को तरस रहे थे
राग द्वेष में झुलस रहे थे
जाने अनजाने सही कर्म किये फिर
किस्मत से महावीर मिले फिर
किस्मत से हम जैन बने फिर
जीवन ने नया मोड़ लिया फिर
वीर से नाता जोड़ दिया फिर
निकल पड़े फिर एक सफर में
मोक्ष मात्र बस अब है नज़र में
लोभ से क्रोध से खुद को बचाना है,
वीर को ध्याना है
बैर किसी से अब नहीं करना है,
प्रेम दया करुणा से ही जीना है और मरना है,
फिर से जैन मुझे बनना है
होके दीवाना दिल झूम रहा है
चरण प्रभु के ढूँढ रहा है
चारों दिशाओं में गूंज रहा है
त्रिशला नंदन, भव दुख भंजन
सोहे निर्विकार निरंजन
वाणी जैसे केसर चन्दन
स्वर्ग से उतरे जैसे सितारे
खिल उठी हैं सारी बहारें
चहक रहे हैं जैसे पंछी सारे
देव भी जिनके चरण पखारे
पर्वों में पर्युषण प्यारे
Source: Rishabh Sambhav Jain (RSJ)


