जग सारा केसर केसर महके
तीनो लोक में खुशियां चहके
मन मेरा बहके, ज़ोर से कहके
पर्युषण फिर लौट के आए हैं
चारो दिशाएं झूम के गाए हैं
कानो में जैसे कोई मुरली सुनाए
अंबर से कोई नाद बजायें
तेज़ हवाएँ, ज़ोर से गाए, रंग उड़ाए
इंद्र-इंद्राणी मिल मंगल गायें
सीप में जैसे कोई सागर पाए
ढोल नगाड़े शंख गुंजायें
अंबर अमृत रस बरसाए, मेघ घटाएं, शोर मचाएं
भाव क्षमा का हर दिल में मिला हो जैसे
ईर्ष्या जलन और बैर का कोई अंत हुआ हो जैसे,
खुशी की इक बात छिड़ी हो जैसे,
दिल से दिल की बात कहीं हो जैसे,
जगमग जगमग दीप जले हो जैसे,
तारे खुद धरती पे गिरे ही जैसे,
धरती ये दुल्हन सी साजी हो जैसे,
शाख के पत्ते झूम रहे हो जैसे, मदम मदम
जैसा कहीं जुगनू ज़मीन पर आया
जैसा कहीं चांदनी जगमग जगमग रोशनी लाए
जैसे कोई मीठी सी लोरी सुनाए,
जैसे कहीं कोयल राग में गाए,
जैसे कोई वीर का जनम मनाये
कैसी मीठी वाणी थी वो, वीर की कहानी थी जो
कल्पसूत्र में
अब मैंने जाना है, वीर को पाना है
वीर की धुन में ही राग लगाना है
यूं तो हज़ारों देखे हैं अवसर
पर अब लगता है पर्व अगर है तो बस है पर्युषण
रात अंधेरे में, दीप जले हों जैसे
जीवन के अंधेरे मिटें हों जैसे
जनमो के बिछड़े फिर से मिले हों जैसे
वीरान शहर में, रौनक आई
लगता है जैसा कोई हो सकता है
एक मुसाफिर भटका - भटका
पहुँच गया हो जैसे अब मंजिल पर
जैसे किसी बच्चे ने चांद लिया हो हाथ में अपने,
जैसे किसी रेत ने लिया समंदर साथ में अपने ..
त्याग तपस्या, इतनी कठिन मैंने,
कभी नहीं देखी, दिल से बताऊँ तो मैं
इतनी सरलता, इतनी समता, ये कोमलता
चंद्रमा की जैसी चाय हो मन में शीतलता
प्रेम दया करुणा बिखरे जैसे मां की ममता
जैन धर्म किस्मत से मिला है
महावीर की राह पे चलने का मौका मिला है,
अब मैंने जाना, पर्युषण में,
क्षमा दान का पुण्य मिला,
त्याग धर्म का पुण्य मिला है,
क्षमा दान का पुण्य मिला है
Source: Rishabh Sambhav Jain (RSJ)


