श्री आदिनाथ जी अर्घ
शुचि निर्मल नीर गंध सुअक्षत, पुष्प चरु ले मन हर्षाय,
दीप धुप फल अर्घ सुलेकर, नाचत ताल मृदंग बजाय।
श्री आदिनाथ के चरण कमल पर बलि बलि जाऊ मन वच काय,
हे करुणानिधि भव दुःख मेटो, याते मैं पूजों प्रभु पाय॥
ॐ ह्वीं श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अनर्धपदप्राप्ताये अर्घ निर्वपामिति स्वाहा ।51
श्री अजितनाथ जी अर्घ
जलफल सब सज्जे, बाजत बज्जे, गुनगनरज्जे मनमज्जे।
तुअ पदजुगमज्जै सज्जन जज्जै, ते भवभज्जे निजकज्जै।
श्री अजित जिनेशं नुतनाकेश, चक्रधरेशं खग्गेशं।
मनवांछितदाता त्रिभुवनत्राता, पूरजों ख्याता जग्गेशं ।।
ॐ ह्ीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा161
श्री सम्भवनाथ जी अर्घ
जल चंदन तंदुल प्रसून चरु, दीप धूप फल अर्घ किया।
तुमको अरपों भाव भगतिधर, जै जै जै शिव रमनि पिया।।
संभव जिन के चरन चरचतें, सब आकुलता मिट जावे।
निज निधि ज्ञान दरश सुख वीरज, निराबाध भविजन पावे।।
ॐ हीं श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।71
श्री अभिनन्दन नाथ जी अर्घ
अष्ट द्रव्य संवारि सुन्दर सुजस गाय रसाल ही।
नचत रजत जरजो चरन जुग, नाय नाय सुभाल ही।।
कलुषताप निकंद श्रीअभिनन्द, अनुपम चन्द हैं।
पद वंद वृन्द जजें प्रभू, भवदंद फंद निकंद हैं।।
ॐ हीं श्रीअभिनन्दन जिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अ्ध्य निर्वपामीति स्वाहा
स्वाहा ।4।
श्री सुमतिनाथ जी अर्ध
जल चंदन तंदुल प्रसून चरु दीप धूप फल सकल मिलाय।
नाचि राचि शिरनाय समरचौं, जय जय जय 2 जिनराय ।।
हरिहर वंदित पापनिकंदित, सुमतिनाथ त्रिभुवनके राय।
तुम पद पद्म सद शिवदायक, जजत मुदितमन उदित सुभाय ।।
ॐ ह्वीं श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा191
श्री पद्मप्रभु जी अर्घ
जल-फल आदि मिलाय गाय गुन, भगति-भाव उमगाय।
जजूं तुमहिं शिवतिय वर जिनवर, आवागमन मिटाय।
पूजूं भाव सों, श्रीपदमनाथ-पद सार, पूजूं भाव सों।
ॐ ही श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।101
श्री सुपार्श्वनाथ जी अर्घ
आठों दरब साजि गुनगाय, नाचत राचत भगति बढ़ाय।
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ।।
तुम पद पूर्जी मनवचकाय, देव सुपारस शिवपुरराय।
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो।।
ॐ ह्वीं श्रीसुपार्श्रनाथजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।111
श्री चंद्रप्रभु जी अर्घ
सजि आठों दरब पुनीत, आठों अंग नमौं।
पूर्जों अष्टम जिन मीत, अष्टम अवनि गर्मों ।I
श्री चंद्रनाथ दुति चंद, चरनन चंद लसै।
मन वच तन जजत अमंद-आतम-जोति जगे।
ॐ ह्वीं श्रीचन्द्रप्रभ जिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अ्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।121
श्री पुष्पदंत जी अर्घ
जल फल सकल मिलाय मनोहर, मनवचतन हुलसाय।
तुम पद पूर्जों प्रीति लाय के, जय जय त्रिभुवनराय ।।
मेरी अरज सुनीजे, पुष्पदन्त जिनराय, मेरी अरज सनीजे।।
ॐ ह्वीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अ्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।131
श्री शीतलनाथ जी अर्घ
शुभ श्री-फलादि वसु प्रासुक द्रव्य साजे।
नाचे रचे मचत बज्जत सज्ज बाजे ।।
रागादिदोष मल मर्द्दन हेतु येवा।
चर्चो पदाब्ज तव शीतलनाथ देवा।।
ॐ ह्वीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अ्ध्य निर्वपामीति स्वाहा1141
श्री श्रेयांसनाथ जी अर्घ
जलमलय तंदुल सुमनचरु अरु दीप धूप फलावली।
करि अरघ चरचौं चरन जुग प्रभु मोहि तार उतावली।।
श्रेयांसनाथ जिनन्द त्रिभुवन वन्द आनन्दकन्द हैं।
दुखदंद फंद निकंद पूरनचन्द जोतिअमंद हैं।।
ॐ हीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा1151
श्री वासुपूज्य जी अर्घ
जल फल दरव मिलाय गाय गुन, आठों अंग नमाई।
शिवपदराज हेत हे श्रीपति! निकट थरौं यह लाई।।
वासुपूज्य वसुपूज-तनुज-पद, वासव सेवत आई।
बाल ब्रह्मचारी लखि जिन को, शिव तिय सनमुख धाई।।
ॐ ही श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।161
श्री विमलनाथ जी अर्घ
आठों दरब संवार, मनसुखदायक पावने।
जजों अरघ भर थार, विमल विमल शिवतिय रमण ।।
ॐ हीं श्रीविमलनाथजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।171
श्री अनन्तनाथ जी अर्घ
शुचि नीर चन्दन शालिशंदन, सुमन चरु दीवा धरौं।
अरु धूष फल जुत अरघ करि, करजोरजुग विनति करौं।।
जगपूज परम पुनीत मीत, अनंत संत सुहावनो।
शिव कंत वंत मंहत ध्यावों, भ्रंत वन्त नशायनो ।।
ॐ ह्ीं श्री अनंतनाथजिनेद्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अ्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।181
श्री धर्मनाथ जी अर्घ
आठों दरब साज शुचि चितहर, हरषि हरषि गुनगाई।
बाजत दमद्म दूम मृदंग गत, नाचत ता थेई थाई।।
परमधरम-शम-रमन धरम-जिन, अशरन शरन निहारी।
पूर्जौ पाय गाय गुन सुन्दर नाचौं दे दे तारी।।
ॐ ह्वीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अध्य निर्वपामीति स्वाहा।191
श्री शांतिनाथ जी अर्घ
वसु द्रव्य सँवारी, तुम ढिग धारी, आनन्दकारी, दृग-प्यारी।
तुम हो भव तारी, करुनाधारी, या तें थारी शरनारी।।
श्री शान्ति जिनेश, नुतशक्रेशं, वृषचक्रेशं चक्रेशं।
हनि अरिचक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाSमृतेशं, मक्रेशं ।।
ॐ हीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।201
श्री कुन्धुनाथ जी अर्ध
जल चंदन तंदुल प्रसून चरु, दीप धूप लेरी।
फलजुत जनन करीं मन सुख धरि, हरो जगत फेरी।।
कुंथु सुन अरज दास केरी, नाथ सुन अरज दासकेरी।
भवसिन्धु पर्यों हौं नाथ, निकारो बांह पकर मेरी।।
ॐ ह्ीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अ्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।211
श्री अरहनाथ जी अर्घ
सुचि स्वच्छ पटीर, गंधगहीर, तंदुलशीर, पुष्प-चरुं।
वर दी्प धूपं, आनंदरुप, ले फल भूपं, अर्ध करुं।।
प्रभु दीन दयालं, अरिकुल कालं, विरद विशालं सुकुमालं।
हरि मम जंजालं, हे जगपालं, अरगुन मालं, वरभालं ।।
ॐ हीं श्रीअरहनाधजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।22
श्री मल्लिनाथ जी अर्घ
जल फल अरघ मिलाय गाय गुन, पूर्जो भगति बढ़ाई।
शिवपदराज हेत हे श्रीधर, शरन गहो मैं आई।।
राग-दोष-मद-मोह हरन को, तुम ही हो वरवीरा।
यातें शरन गही जगपतिजी, वेगि हरो भवपीरा ।।
ॐ ह्वीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।23
श्री मुनिसुव्रतनाथ जी अर्घ
जलगंध आदि मिलाय आठों दरब अरघ सजौं वरौं।
पूर्जों चरन रज भगतिजुत, जातें जगत सागर तरों।।
शिवसाथ करत सनाथ सुव्रतनाथ, मुनिगुन माल हैं।
तसु चरन आनन्दभरन तारन तरन, विरद विशाल हैं।।
ॐ ही श्रीमुनिसुव्रतजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।241
श्री नमिनाथ जी अर्ध
जल फलादि मिलाय मनोहरं, अरघ धारत ही भवभय हरं।
जजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदाम्बुज प्रीति लगाय के ।।
ॐ ह्ीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।251
श्री नेमिनाथ जी अर्घ
जल फल आदि साज शुचि लीने, आठों दरब मिलाय।
अष्टम छिति के राज कारन को, जजौं अंग वसु नाय ।।
दाता मोक्ष के, श्रीनेमिनाथ जिनराय, दाता0।
ॐ हीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अध्य निर्वपामीति स्वाहा।261
श्री पार्श्वनाथ जी अर्घ
नीर गंथ अक्षतान, पुष्प चारु लीजिये।
दीप धूप श्रीफलादि, अर्ध तें जजीजिये।।
पार्श्वनाथ देव सेव, आपकी करुं सदा।
दीजिए निवास मोक्ष, भूलिये नहीं कदा।।
ॐ हीं श्रीपार्श्रनाथ जिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अध्य निर्वपामीति स्वाहा।27
श्री महावीर स्वामी जी अर्घ
जल फल वसु सजि हिम थार, तन मन मोद धरी।
गुण गाऊँ भवदथितार, पूजत पाप हरौं ।।
श्री वीर महा-अतिवीर, सन्मति नायक हो।
जय वर्द्धमान गुणधीर, सन्मतिदायक हो।।
ॐ ह्ीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अनर्ध्यपदप्राप्तये-अ्ध्य निर्वपामीति स्वाहा।281
श्री बाहुबली स्वामी जी अर्घ
हूँ शुद्ध निराकुल सिद्धो सम, भवलोक हमारा वासा ना।
रिपु रागरु द्वेष लगे पीछे, यातें शिवपद को पाया ना।।
निज के गुण निज में पाने को, प्रभु अर्घ संजोकर लाया हूँ।
हे बाहुबली तुम चरणों में, सुख सम्पति पाने आया हूँ।
ॐ ह्वीं श्री-बाहुबली-जिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्ध्म निर्वापमितिस्वाहा।291
पञ्च बालयति जी अर्घ
पञ्च बालयति जी अर्घ
सजि वसुविधि द्रव्य मनोज़ अरध बनावत हैं।
वसुकर्म अनादि संयोग, ताहि नशावत हैं।।
श्री वासु-पूज्य-मल्ली-नेम, पारस वीर अती।
नमूं मन-वच-तन धरी प्रेम, पांचो बालयति।
ॐ ह्ीं श्री-पंचबालयति-तीर्थकरेभ्यो अनर्घपदप्राप्तये अर्ध्म निर्वापमितिस्वाहा 130।
सोलहकारण भावना अर्ध
जल फल आठों दरव चढ़ाय 'द्यानत' वरत करौ मन लाय।
परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो।।
दरशविशुद्धि भावना भाय सोलह तीर्थकर-पद-दाय।
परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो ।।
ॐ ह्वीं दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणेभ्यः अनर्ध्यपदप्राप्तये-अर्ध्यनिर्वपामीति ।31।
पंचमेरु जी अर्ध
आठ दरवमय अरघ बनाय, 'द्यानत' पूर्जी श्रीजिनराय।
महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय।।
पांचो मेरू असी जिन थाम, सब प्रतिमा जी को करौं प्रणाम।
महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय।।
ॐ ही पंचमेरूसम्बन्धि-जिन चैत्यालयस्थ-जिनबिम्बेभ्यः अर्ध्य निर्वपामीति स्वाहा 132।
नन्दीश्वर द्वीप अर्ध
यह अरघ कियो निजहेत, तुमको अरपत हों।
धानत किज्यो शिवखेत, भूमि समरपतु हों।।
नन्दीश्वर श्रीजिनधाम, बावन पुंज करों।
वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरों ।।
नन्दीश्वर दीप महान चारों दिशि सोहें।
बावन जिन मन्दिर जान सूर-नर-मन-मोहें।।
ॐ हीं श्री-नन्दीश्वर-द्वीपे पूर्व-पश्चिमोत्तर-दक्षिण-दिशु द्व-पंचास-जिनालय-
स्थित जिन प्रतिमाभ्यो अनर्धपदप्राप्तये अर्ध्म निर्यापमिति स्वाहा ।33।
दशलक्षण धर्म अर्घ
आठो दरब संवार, धानत अधिक उछाह सों।
भाव-आताप निवार,दस लच्छन पूजो सदा ।।
ॐ ह्ीं श्री-उत्तम-क्षमादि-दशलक्षण-धर्माय अनर्धपदप्राप्तये अर्ध्म
निर्वापमिति स्वाहा 134।
रत्नत्रय अर्ध
आठ दरब निराधार, उत्तम सों उत्तम किये।
जनम-रोग निरवार, सम्यक रत्नत्रय भजुं ॥
ॐ ह्वीं श्री-सम्यग्-रत्नत्रयाय अनर्धपदप्राप्तये अर्ध्म निर्वापमिति स्वाहा।351
सप्तर्षि अर्ध
जल गंध अक्षत पुष्प चरुवर, दीप धुप सु लावना।
फल ललित आठों द्रव्य मिश्रित, अर्घ कीजे पावना ॥
मन्वादि चारित्रऋद्धि धारक, मुनिन की पूजा करू।
ता करे पातक हरे सारे, सकल आनंद विस्तरुं।
ॐ हीं श्री-मन्वादिसप्तर्षिभ्यो अनर्धपदप्राप्तये अर्ध्म निर्वापमिति स्वाहा ।361
निर्वाण क्षेत्र जी अर्घ
जल गंध अक्षत पुष्प चरु फल, दीप धुपायन धरौ।
धानत करो निरभय जगत सो, जोर कर विनती करौ।
सम्मेद्विरि गिरनार चंपा पावापुर कैलाश को।
पूजो सदा चौबीस जिन, निर्वाण भूमि निवास को॥
ॐ ह्ीं श्री-चतुर्विश-तीर्थकर-निर्वाण-क्षेत्रेभ्यो अर्घ निर्यापमिति स्वाहा 1371
श्री सम्मेद शिखर जी अर्घ
जल गंथाक्षत फुल सु नेवज लीजिये।
दीप धुप फल अर्ध सु लेकर चढ़ाइए।।
पूजो शिखर सम्मेद सु मन वच काय जू।
नरकादि दुःख टरै अचल पद पाय जू।
ॐ ह्वीं श्री-सम्मेद-शिखर-सिद्धक्षेत्र-पर्वते बीस-तीर्थकर-आदि-असंख्यात-
मुनि-मुक्ति-प्राप्ताय अनर्घपदप्राप्तये अर्ध्म निर्वापमिति स्वाहा ।38।
सरस्वती (जिनवाणी) जी अर्घ
जलचन्दन अक्षत, फूल चरु, चत, दीप धूप अति फल लावै।
पूजा को ठानत, जो तुम जानत, सो नर द्यानत सुखपावै।।
तीर्थकर की ध्यनि, गनधर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञानमई।
सो जिनवर वानी, शिवसुखदानी, त्रिभुवन पूज्य भई।।
ऊँ हीं श्री जिनमुखोद्ध भवसरस्वतीदेव्यै अर्ध्यम निर्वपामीति स्वाहा ।39।
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का अर्घ
श्री विद्यासागर के चरणों में झुका रहा अपना माथा
जिनके जीवन की हर चर्या बन पड़ी स्वयं की नाव गाथा
वह जैन आगम का सुधा कलश जो बिखरआते हैं गली-गली
जिनके दर्शन को पाकर के खिलते मुरझाई हृदय कली
भावों की निर्मल सरिता में आवाहन करने आया हूं
मेरा सारा दुख दर्द हरो यह अर्ध्य भेंट ने आया हूं
है तपो मूर्ति हे आराधक हे योगेश्वर हे महासंत
हे अरुण कामना देख सके युग युग तक आगामी बसंत
ऊँ हीं श्री 108 आचार्य विद्यासागराय अनर्ध्यपद प्राप्तर्य अर्ध्य नि0 स्वाहा।
श्री ऋषिमंडल अर्घ
जल फलादिक द्रव्य लेकर अर्ध सुन्दर कर लिया।
संसार रोग निवार भगवन वारि तुम पद में दिया।।
जहा सुभग ऋषिमंडल विराजे पूजी मन वाच तन सदा।
तिस मनोवांछित मिळत सब सुख स्वप्र में दुःख नहि कदा॥
ॐ ह्वीं श्री-सर्वोपद्रव-विनाशन-समथार्य ऋषिमंडलाय अर्ध्म निर्यापमिति
स्वाहा 140।
श्री भरतेश्वर स्वामी जी अर्घ
श्री भरतेश्वर स्वामी जी अर्घ
भरतेश्वर महाराज थारा गुण गाऊ,
था घर में ही वैराग चरणों में धयाऊ।
मैं अष्ट द्रव्य ले आय पूजा के लिए,
मैं पूजा भाव रचाय भव भव दुःख हरे॥
ॐ हीं श्री भरतेश्वराय अनर्धपदप्राप्तये अर्ध्म निर्वापमिति स्वाहा ।41।
श्री गौतम स्वामी जी अर्घ
भरतेश्रुर महाराज थारा गुण गाऊ,
था घर में ही वैराग चरणों में थयाऊ।
मैं अष्ट द्रव्य ले आय पूजा के लिए,
मैं पूजा भाव रचाय भव भव दुःख हरे॥
ॐ ह्ीं श्री महावीर-स्वमिन गौतमादि-एकादश-गणधरेभ्यो अनर्धपदप्राप्तये
अर्ध्म निर्वापमिति स्वाहा 142।
श्री जम्बू स्वामी जी अर्ध
मथुरा चौरासी थाम से निर्वाण गये।
मैं पूजूं जम्बूस्वामी अंतिम मोक्ष गए।।
ॐ ह्वीं श्री जम्बू-स्वामी-मुक्ति-प्राप्ताय अनर्धपदप्राप्तये अर्ध्म निर्वापमिति
स्वाहा ।43।
अंतरायनाशय अर्ध
लाभ की अंतराय के वश जीव सुख ना लहै।
जो करै कष्ट उत्पात सगरे कर्मवस विरथा रहै।।
नहीं जोर वाको चले इक छिन दीन सौ जग में फिरै।
अरहंत सिद्धसु अधर धरिकै लाभ यौ कर्म को हरै।।
ऊँ हीं लाभांतरायकर्म रहिताभ्याम अहर्तसिद्ध परमेष्ठिभ्याम अध्यम
निर्वपामीति स्वाहा 144।
श्री मानस्तंभ जी अर्घ
जल गन्धादि द्रव्य मिलाकर निज निज पूजो चाव में।
मान स्तम्भ पे बैठे भगवन, उनको पुजू भाव से॥


