इस व्रत की विधि इस प्रकार है-कि भादों सुदी दशमी के दिन चारों प्रकार
के आहारों को त्यागकर समस्त गृहारम्भ का त्याग करे और परिग्रह का भी
प्रमाणकर जिनालय में जाकर श्री जिनेन्द्रदेव की भाव सहित
अभिषेकपूर्वक पूजा करे। सामायिक स्वाध्याय करे। धर्म कथा के सिवाय
अन्य विकथाओं का त्याग करे, रात्रि में भजनपूर्वक जागरण करे। पश्चात्
दसरे दिन चौबीस तीर्थकरों की अभिषेकपूर्वक पूजा करके अतिथियों
(मुनि व श्रावक) को भोजन कराकर आप पारणा करे। चारों प्रकार के दान
देवे। इस प्रकार दश वर्ष तक यह व्रत पालन कर पश्चात् उद्यापन करे।


अर्थात् चमर, छत्र, घण्टा, झारी, ध्वजा आदि दश-दश उपकरण जिनमंदिरों
में भेंट देवे और दश प्रकार के श्रीफल आदि फल दश घर के श्रावकों को
बांटे। यदि उद्यापन की शक्ति न होवे, तो दूना व्रत करे।
उत्तम व्रत उपवास करने से, मध्यम कांजी आहार और जघन्य एकाशन
करने से होता है।


इस व्रत के दिन श्री शीतलनाथ भगवान की पूजा करें एवं "ॐ ह्वीं श्रीं क्लीं
ऐं अर्ह श्री शीतलनाथ जिनेंद्राय नमः मंत्र का जाप्य करें।


इस प्रकार राजा प्रजा सबने व्रत की विधि सुनकर अनुमोदना की और
स्वस्थान को गये। दुर्गन्धा कन्या ने मन, वचन-काय से सम्यक्त्वपूर्वक व्रत
को पालन किया। एक समय दसवें तीर्थकर श्री शीतलनाथ भगवान के
कल्याणक के समय देव तथा इन्द्रों का आगमन देखकर उस दुर्गन्धा कन्या
ने निदान किया कि मेरा जन्म स्वर्ग में होवे, सो निदान के प्रभाव से यह
राजकन्या स्वर्ग में अप्सरा हुई और उसका पिता राजा मरकर दसवें स्वर्ग
में देव हुआ।
यह दुर्गन्धा कन्या अप्सरा के भव से आकर मगध देश के पृथ्वीतिलक नगर
में राजा महिपाल की रानी मदनसुन्दरी के मदनावती नाम की कन्या हुई,
सो अत्यन्त रूपवान और सुगंधित शरीर हुई और कौशाम्बी नगरी के राजा
अरिनंदन के पुत्र पुरुषोत्तम के साथ इस मदनावती का ब्याह हुआ। इस
प्रकार वे दम्पत्ति सुखपूर्वक कालक्षेप करने लगे।


कल्याणक क समय दव तथा इन्द्रा का आगमन दखकर उस दुगन्था कन्या
ने निदान किया कि मेरा जन्म स्वर्ग में होवे, सो निदान के प्रभाव से यह
राजकन्या स्वर्ग में अप्सरा हुई और उसका पिता राजा मरकर दसवें स्वर्ग
में देव हुआ।


यह दुर्गन्धा कन्या अप्सरा के भव से आकर मगध देश के पृथ्वीतिलक नगर
में राजा महिपाल की रानी मदनसुन्दरी के मदनावती नाम की कन्या हुई,
सो अत्यन्त रूपवान और सुगंधित शरीर हुई और कौशाम्बी नगरी के राजा
अरिनंदन के पुत्र पुरुषोत्तम के साथ इस मदनावती का ब्याह हुआ। इस
प्रकार वे दम्पत्ति सुखपूर्वक कालक्षेप करने लगे।
एक समय वन में सुगुप्ताचार्य नाम के आचार्य संघ सहित आये सो वह
राजकुमार पुरुषोत्तम अपनी स्त्री सहित वंदना को गया तथा और भी नगर
के लोग वंदना को गये सो स्तुति, नमस्कार आदि करने के अनन्तर श्रीगुरु
के मुख से जीवादि तत्त्वों का उपदेश सुना। पश्चात् पुरुषोत्तम ने कहा-है
स्वामी! मेरी यह मदनावती स्त्री किस कारण से ऐसी रूपवान और अति
सुगंधित शरीर है? तब श्री गुरु ने मदनावती के पूर्व भवांतर कहे और
सुर्गंधदशमी के व्रत का माहात्म्य बताया तो पुरुषोत्तम और मदनावती दोनों
अपने भवांतर की कथा सुनकर संसार, देह भोगों से विरक्त हो दीक्षा लेकर
तपश्ररण करने लगे।


इस प्रकार तपश्चरण के प्रभाव से मदनावती स्त्रीलिंग छेदकर सोलहवें स्वर्ग
में देव हुई। वहाँ बाईस सागर सुख से आयु पूर्ण करके अंत समय चयकर
मगध देश के वसुंधा नगरी में मकरकेतु राजा के यहाँ देवी पट्टरानी के
कनककेतु नाम का सुन्दर गुणवान पुत्र हुआ।
पिता के दीक्षा ले लेने पर कितने काल राज्य करके वह भी अपने
मकरध्वज पुत्र को राज्य दे दीक्षा लेकर तपक्षरण करके और देश-विदेशों
में बिहार करके अनेक जीवों को धर्म के मार्ग में लगाने लगे। इस प्रकार
कितने काल कनककेतु मुनिनाथ को केवलज्ञान हुआ और बहुत काल तक
उपदेशरूपी अमृत की वृष्टि करके शेष अघाति कमों का नाशकर परम पद
मोक्ष को प्राप्त हुए।
इस प्रकार सुगंधदशमी का व्रत पालकर दुर्गन्धा भी अनुक्रम से मोक्ष को
प्राप्त हुई तो भव्य जीव यदि यह व्रत पालें तो अवश्य ही उत्तमोत्तम सुखों
को पायें। 


एक समय वन में सुगुप्ताचार्य नाम के आचार्य संघ सहित आये सो वह
राजकुमार पुरुषोत्तम अपनी स्त्री सहित वंदना को गया तथा और भी नगर
के लोग वंदना को गये सो स्तुति, नमस्कार आदि करने के अनन्तर श्रीगुरु
के मुख से जीवादि तत्वों का उपदेश सुना। पश्चात् पुरुषोत्तम ने कहा-हे
स्वामी! मेरी यह मदनावती स्त्री किस कारण से ऐसी रूपवान और अति
सुगंधित शरीर है? तब श्री गुरु ने मदनावती के पूर्व भवांतर कहे और
सुगंधदशमी के व्रत का माहात्म्य बताया तो पुरुषोत्तम और मदनावती दोनों
अपने भवांतर की कथा सुनकर संसार, देह भोगों से विरक्त हो दीक्षा लेकर
तपश्चरण करने लगे।


इस प्रकार तपश्चरण के प्रभाव से मदनावती स्त्रीलिंग छेदकर सोलहवें स्वर्ग
में देव हुई। वहाँ बाईस सागर सुख से आयु पूर्ण करके अंत समय चयकर
मगथ देश के वसुंधा नगरी में मकरकेतु राजा के यहाँ देबी पट्टरानी के
कनककेतु नाम का सुन्दर गुणवान पुत्र हुआ।
पिता के दीक्षा ले लेने पर कितने काल राज्य करके वह भी अपने
मकरध्वज पुत्र को राज्य दे दीक्षा लेकर तपश्चरण करके और देश-विदेशो
में विहार करके अनेक जीवों को धर्म के मार्ग में लगाने लगे। इस प्रकार
कितने काल कनककेतु मुनिनाथ को केवलज्ञान हुआ और बहुत काल तक
उपदेशरूपी अमृत की वृष्टि करके शेष अघाति कर्मों का नाशकर परम पदमोक्ष को प्राप्त हुए।
इस प्रकार सुगंधदशमी का व्रत पालकर दुर्गन्धा भी अनुक्रम से मोक्ष को
प्राप्त हुई तो भव्य जीव यदि यह व्रत पा्ले तो अवश्य ही उत्तमोत्तम सुखों
को पावें।