जम्बृद्वीप संबंधी भरतक्षेत्र के मगध (बिहार) प्रांत में राजगृही नगर है। वहाँ
के राजा हेमप्रभ और रानी विजयावती थी। इस राजा के यहाँ महाशर्मा
नामक नौकर था और उनकी स्त्री का नाम प्रियंवदा था। इस प्रियंवदा के
गर्भ से कालभैरवी नामक एक अत्यन्त कुरुपी कन्या उत्पन्न हुई कि जिसे
देखकर माता-पितादि सभी स्वजनों तक को घृणा होती थी।
एक दिन मतिसागर नामक चारणमुनि आकाशमार्ग से गमन करते हुए
उसी नगर में आये, तो उस महाशर्मा ने अत्यन्त भक्ति सहित श्री मुनि को
पड़गाह कर विधिपूर्वक आहार दिया और उनसे धर्मोपदेश सुना। पश्चात्
जुगल कर जोड़कर विनययुक्त हो पूछा-हे नाथ! यह मेरी कालभैरवी नाम
की कन्या किस पापकर्म के उदय से ऐसी कुरुपी और कुलक्षणी उत्पन्न हुई
है, सो कृपाकर कहिए? तब अवधिज्ञान के धारी श्री मुनिराज कहने लगे,
वत्स! सुनो-
उज्जेन नगरी में एक महिपाल नाम का राजा और उसकी वेगावती नाम=
की रानी थी। इस रानी से विशालाक्षी नाम की एक अत्यन्त सुन्दर रूपवान
कन्या थी, जो कि बहुत रूपवान होने के कारण बहुत अभिमानिनी थी
और इसी रूप के मद में उसने एक भी सद्गुण न सीखा। यथार्थ है-अहंकारी
(मानी) नरों को विद्या नहीं आती है।
एक दिन वह कन्या अपनी चित्रसारी में बैठी हुई दर्पण में अपना मुख देख
रही थी कि इतने में ज्ञानसूर्य नाम के महातपस्वी श्री मुनिराज उसके घर से
आहार लेकर बाहर निकले, सो इस अज्ञान कन्या ने रूप के मद से मुनि
को देखकर खिड़की से मुनि के ऊपर थूक दिया और बहुत हर्षित हुई।
परन्तु पृथ्वी के समान क्षमावान श्री मुनिराज तो अपनी नीची दृष्टि किये
हुए ही चले गये। यह देखकर राजपुरोहित इस कन्या का उन्मत्तपना देख
उस पर बहुत क्रोथित हुआ और तुरंत ही प्रासुक जल से श्री मुनिराज का
शरीर प्रक्षालन करके बहुत भक्ति से वैयावृत्य कर स्तुति की। यह देखकर
वह कन्या बहुत लज्जित हुई और अपने किये हुए नीच कृत्य पर पश्चाताप
करके श्री मुनि के पास गई और नमस्कार करके अपने अपराध की क्षमा
मांगी। श्री मुनिराज ने उसको धर्मलाभ कहकर उपदेश दिया। पश्चात् वह
कन्या वहाँ से मरकर तेरे घर यह काल भैरवी नाम की कन्या हुई है। इसने
जो पूर्वजन्म में मुनि की निंदा व उपसर्ग करके जो घोर पाप किया है उसी
के फल से यह ऐसी कुरुपा हुई है, क्योंकि पूर्व संचित कर्मों का फल भोगे
बिना छुटकारा नहीं होता है इसलिए अब इसे समभावों से भोगना ही
कर्तव्य है और आगे को ऐसे कर्म न बंधे ऐसा समीचीन उपाय करना गोण्य
अब पुनः वह महाशर्मा बोला-हे प्रभो! आप ही कृपाकर कोई ऐसा उपाय
बताइये कि जिससे वह कन्या अब इस दुःख से छूटकर सम्यक् सुखों को
प्राप्त होवे तब श्री मुनिराज बोले-वत्स! सुनो-
संसार में मनुष्यों के लिए कोई भी कार्य असाध्य नहीं है, सो भला यह
कितना सा दुःख है? जिनधर्म के सेवन से तो अनादिकाल से लगे हुए
जन्म-मरणादि दुःख भी छूटकर सच्चे मोक्षसुख की प्राप्ति होती है और
दुःखों से छूटने की तो बात ही क्या है? वे तो सहज ही में छूट जाते हैं।
इसलिए यदि यह कन्या षोडशकारण भावना भावे और व्रत पाले, तो
अल्पकाल में ही स्त्रीलिंग छेदकर मोक्ष-सुख को पावेगी। तब वह महाशर्मा
बोला-हे स्वामी! इस व्रत की कौन-कौन भावनाएं और विधि क्या है? सो
कृपाकर कहिए। तब मुनिराज ने इन जिज्ञासुओंको निम्न प्रकार
षोडशकारण व्रत का स्वरूप और विधि बताई।
इन १६ भावनाओं को यदि केवली-श्रुतकेवली के पादमूल के निकट
अन्तःकरण से चिन्तवन की जाये तथा तदनुसार प्रवर्तन किया जाये तो
इनका फल तीर्थकर नाम कर्म के आश्रव का कारण है। आचार्य महाराज
व्रत की विधि कहते हैं-
भादों, माघ और चैत्र वदी एकम् से कुवार, फाल्गुन और वैशाख वदी एकम्
तक (एक वर्ष में तीन बार) पूरे एक-एक मास तक यह व्रत करना चाहिए।
इन दिनों तेला-बेला आदि उपवास करें अथवा नीरस वा एक, दो, तीन
आदि रस त्यागकर ऊनोदरपूर्वक अतिथि या दीन दुःखी नर या पशुओं को
भोजनादि दान देकर एकभुक्त करें। अंजन, मंजन, वस्त्रालंकार विशेष
धारण न करे, शीलव्रत (ब्रह्मचर्य) रखे, नित्य घोडशकारण भावना भावे
और यंत्र बनाकर पूजाभिषेक करे, त्रिकाल सामायिक करे और (ऊ ह्रीं
दर्शन-विशुद्धि, विनयसम्पन्नता, शीलव्रतेष्वनतिचार अभीक्ष्णज्ञानोपयोग,
संवेग, शक्तितरत्याग, शक्तितस्तप, साधुसमाधि, वैयावृत्यकरण, अर्हद्धक्ति,
आचार्यभक्ति, उपाध्यायभक्ति (बहुश्रुतभक्ति), प्रवचनभक्ति
आवश्यकापरिहाणि, मार्ग प्रभावना, प्रवचनवात्सल्यादि बोडशकारणेभ्योनमः)।
इस महामंत्र का दिन में तीन बार १०८ बार जाप करे। इस प्रकार इस व्रत
को उत्कृष्ट सोलह वर्ष, मध्यम ५ अथवा दो वर्ष और जघन्य १ वर्ष करके
यथाशक्ति उद्यापन करे अर्थात् सोलह-सोलह उपकरण श्री मंदिरजी में भेंट
दे और शास्त्र व विद्यादान करे, शास्त्र भण्डार खोले, सरस्वती मंदिर बनावे,
पवित्र जिनधर्म का उपदेश करे और करावे इत्यादि यदि द्रव्य खर्च करने
इन दिनों तेला-बेला आदि उपवास करें अथवा नीरस वा एक, दो, तीन
आदि रस त्यागकर ऊनोदरपूर्वक अतिथि या दीन दुःखी नर या पशुओं को
भोजनादि दान देकर एकभुक्त करें। अंजन, मंजन, वस्त्रालंकार विशेष
धारण न करे, शीलव्रत (ब्रह्मचर्य) रखे, नित्य षोडशकारण भावना भावे
और यंत्र बनाकर पूजाभिषेक करे, त्रिकाल सामायिक करे और (ॐ ह्रीं
दर्शन-विशुद्धि, विनयसम्पन्नता, शीलव्रतेष्वनतिचार अभीक्ष्णज्ञानोपयोग,
संवेग, शक्तितस्त्याग, शक्तितस्तप, साधुसमाधि, वैयावृत्यकरण, अर्हद्भक्ति,
आचार्यभक्ति, उपाध्यायभक्ति (बहुश्रुतभक्ति), प्रवचनभक्ति
आवश्यकापरिहाणि, मार्ग प्रभावना, प्रवचनवात्सल्यादि षोडशकारणेभ्योनमः)।
इस महामंत्र का दिन में तीन बार १०८ बार जाप करे। इस प्रकार इस व्रत
को उत्कृष्ट सोलह वर्ष, मध्यम ५ अथवा दो वर्ष और जघन्य १ वर्ष करके
यथाशक्ति उद्यापन करे अर्थात् सोलह-सोलह उपकरण श्री मंदिरजी में भेंट
दे और शास्त्र व विद्यादान करे, शास्त्र भण्डार खोले, सरस्वती मंदिर बनावे,
पवित्र जिनधर्म का उपदेश करे और करावे इत्यादि यदि द्रव्य खर्च करने
की शक्ति न हो तो व्रत द्विगुणित करे।
इस प्रकार ऋषिराज के मुख से व्रत की विधि सुनकर कालभैरवी नाम की
उस ब्राह्मण कन्या ने षोडशकारण व्रत स्वीकार करके उत्कृष्ट रीति से
पालन किया, भावना भायी और विधिपूर्वक उद्यापन किया, पीछे वह आयु
के अंत में समाधिमरण द्वारा स्त्रीलिंग छेदकर सोलहवें (अच्युत) स्वर्ग में
देव हुई। वहाँ से बाईस सागर आयु पूर्ण कर वह देव जम्बूद्वीप के विदेहक्षेत्र
संबंधी अमरावती देश के गंधर्व नगर में राजा श्रीमंदिर की रानी महादेवी के
सीमंधर नाम का तीर्थकर पुत्र हुआ सो योग्य अवस्था को प्राप्त होकर
राज्योचित सुख भोग जिनेश्वरी दीक्षा ली और घोर तपश्चरण कर
केवलज्ञान प्राप्त करके बहुत जीवों को धर्मोपदेश दिया तथा आयु के अंत
में समस्त अघाति कर्मों का भी नाश कर निर्वाण पद प्राप्त किया।
इस प्रकार इस व्रत को धारण करने से कालभैरवी नाम की ब्राह्मण कन्या
ने सुर-नर भवों के सुखों को भोगकर अक्षय अविनाशी स्वाधीन मोक्षसुख
को प्राप्त कर लिया, तो जो अन्य भव्यजीव इस व्रत को पालन करेंगे
उनको भी अवश्य ही उत्तम फल की प्राप्ति होवेगी।


