जम्बृद्वीप के विदेह क्षेत्र में कक्ष नाम का एक देश और वीतशोकपुर नाम
का एक नगर है। वहाँ एक अत्यन्त पुण्यवान वैश्रवण नाम का राजा रहता
था, जो कि पुत्रवत् अपनी प्रजा का पालन करता था।
एक दिन वह (वैश्रवण) राजा बसंत ऋतु में क्रीड़ा के निमित्त उद्यान में यत्र-
तत्र सानंद विचर रहा था कि इतने ही में उसकी दृष्टि एक शिला पर
विराजमान ध्यानस्थ श्री मुनिराज पर पड़ी। सो तुरंत ही हर्षित होकर वह
राजा श्री मुनिराज के समीप आया और विनययुक्त नमस्कार करके बैठ
गया। श्री मुनिराज जब ध्यान कर चुके तो उन्होंने धर्मवृद्धि कहकर
आशीर्वाद दिया और इस प्रकार धर्मोपदेश देने लगे-यह जीव अनादिकाल
से मोहकर्मवश मिध्या श्रद्धान, ज्ञान और आचरण करता हुआ पुनः-पुनः
कर्मबंध करता और संसार में जन्म-मरणादि अनेक प्रकार दुःखों को
भोगता है इसलिए जब तक इस रत्नत्रय (जो कि आत्मा का निज स्वभाव
है) की प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक यह (जीव) दुःखों से छूटकर
निराकुलता स्वरूप सच्चे सुख व शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती, जो कि
वास्तव में इस जीव को हितकारी है। इसलिए भगवान ने=
"सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग." अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्य्ज्ञान और
सम्यक्चारित्र को मोक्षमार्ग कहा है और सच्चा सुख मौक्ष अवस्था ही में
मिलता है, इसलिए मोक्षमार्ग में प्रवृत्ति करना मुमुक्षु जीवों का परम कर्तव्य है।


(१) पुद्रलादि परद्रव्यों से भिन्न निज स्वरूप का श्रद्धान (स्वानुभव) तथा
उसके कारणस्वरूप सप्त तत्त्वों और सत्यार्थ देव, गुरु व शास्त्र का श्रद्धान
होना सो सम्यग्दर्शन है। यह सम्यग्दर्शन अष्ट अंग सहित और २५ मल दोष
रहित धारण करना चाहिए अर्थात् जिन भगवान के कहे हुए वचनों में
शंका नहीं करना, संसार के विषयों की अभिलाषा न करना, मुनि आदि
साधर्मियों के मलिन शरीर को देखकर म्लानि न करना, धर्मगुरु के सत्यार्थ
तत्त्वो की यथार्थ पहचान करना अर्थात् कुगुरु (रागीद्वेषी भेषी परिग्रही
साधु गृहस्थ) कुदेव (रागीद्वेषी भयंकर देव) कुथर्म (हिंसापोषक क्रियाओं)
की प्रशंसा भी न करना, धर्म पर लगते हुए मिथ्या आक्षेपों को दूर करना
और अपनी बड़ाई व परनिंदा का त्याग करना, सम्यक् श्रद्धान और चारित्र
से डिगते हुए प्राणियों को धर्मोपदेश तथा द्रव्यादि देकर किसी प्रकार स्थिर
करना और धर्म और धर्मात्माओं में निष्कपट भाव से प्रेम करना और
सर्वोपरि सर्व हितकारी श्री दिगम्बर जैनाचार्यों द्वारा बताये हुए श्री पवित्र
जिनधर्म का यथार्थ प्रभाव सर्वोपरि प्रकट कर देना थे ही आ अं ै।


इनसे विपरीत शंकादि आठ दोष, १. जाति २. कुल ३. बल ४. ऐश्वर्य ५.
धन ६. रूप ७. विद्या और ८. तप इन आठ के आश्रित हो गर्व करना सो
आठ मद, कुगुरु, कुदेव, कुधर्म और कुगुरु सेवक, कुदेव आराधक और
कुधर्म धारक, ये छः अनायतन और देवमूढ़ता, लोकमूढ़ता पाखण्ड मूढ़ता
इस प्रकार ये पच्चीस सम्यकत्व के दूषण हैं। इससे सम्यकत्व का एकदेश
घात होता है इसलिए इन्हें त्याग देना चाहिए।


(२) पदार्थों के यथार्थ स्वरूप को संशय, विपर्यय व अनध्यवसाय आदि
दोषों से रहित जानना सो सम्यग्ज्ञान है।
(३) आत्मा की निज परिणति (जो वीतराग रूप है) में ही रमण करता है
अर्थात् रागद्वेषादि विभाव भावों, क्रोधादि कषायों से आत्मा को अलग
करने व बचाने के लिए व्रत, संयम, तपादिक करना सो सम्यक्चारित्र है।
इस प्रकार इस रत्नत्रयरूप मोक्षमार्ग को समझकर और उसे स्वशक्ति
अनुसार धारण करके जो कोई भव्यजीव बाहा तपाचरण धारण करता है
वही सच्चे (मोक्ष) सुख को प्राप्त होता है।
इस प्रकार रत्नत्रय का स्वरूप कहकर अब बाह्ा व्रत पालने की विधि कहते हैं-
भादो, माघ और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में, तेरस, चौदस और पूनम इस
प्रकार तीन दिन यह व्रत किया जाता है और १२ को व्रत की धारणा तथा
प्रतिपदा को पारणा किया जाता है अर्थात् १२ को श्री जिन भगवान की
पूजनाभिधेक करके एकाशन (एकभुक्त) करे और फिर मध्यान्हकाल की
सामायिक करके उसी समय से चारों प्रकार के (खाद्य, स्वाद्य, लेह् और
पेय) आहार तथा विकथाओं और सब प्रकार के आरंभों का त्याग करें।
इस प्रकार तेरस, चौदस और पूनम तीन प्रोषथ दिन (प्रोषथ उपवास) करे
और प्रतिपदा (पडवा) को श्री जिनदेव के अभिषेक पूजन के अनन्तर
सामायिक करके तथा किसी अतिथि वा दुःखित-भूखित को भोजन
कराकर भोजन करे, इस दिन भी एकभुक्त ही करना चाहिए।
इन व्रतों के पाँचो दिनों में समस्त सावद्य (पाप बढ़ाने वाले) आरंभ और
विशेष परिग्रह का त्याग करके अपना समय सामायिक, पूजा, स्वाध्यायादि
धर्मध्यान में बितावे। इस प्रकार यह व्रत १२ वर्ष तक करके पश्चात् उद्यापन
करे और यदि उद्यापन की शक्ति न होवे तो दूना व्रत करे, यह उत्कृष्ट व्रत
की विधि है।


यदि इतनी भी शक्ति न होवे तो बेला करे या कांजी आहार करे तथा आठ
वर्ष करके उद्यापन करे यह मध्यम विधि है और जो इतनी शक्ति न होये तो
एकासना करके करे और तीन ही वर्ष या पाँच वर्ष तक करके उद्यापन करे,
यह जघन्य विधि है। सो स्वशक्ति अनुसार व्रत धारण कर पालन करे।
नित्य प्रतिदिन में त्रिकाल सामायिक तथा रत्नत्रय पूजन विधान करे और
तीन बार इस व्रत का जाप्य जपे अर्थात् 'ॐ हीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यो
नम:', इस मंत्र की १०८ बार जाप जपे, तब एक जाप्य होती है।


इस प्रकार व्रत पूर्ण होने पर उद्यापन करे अर्थात् श्री जिनमंदिर में जाकर
महोत्सव करे। छत्र, चमर, झारी, कलश, दर्पण, पंखा, ध्वजा और ठमनी
आदि मंगल द्रव्य चढ़ावे, चन्दोवा बंधावे और कम से कम तीन शास्त्र मंदिर
में पधरावे, प्रतिष्ठा करे, उद्यापन के हर्ष में विद्यादान करे, पाठशाला,
छात्रावास, अनाथालय, पुस्तकालय आदि संस्थाएं ध्रौव्यरूप से स्थापित
करे और निरन्तर रत्नत्रय की भावना भाता रहे।


इस प्रकार श्री मुनिराज ने राजा वैश्रवण को उपदेश दिया सो राजा ने
सुनकर श्रद्धापूर्वक इस व्रत को यथाविधि पालन कर किया, पूर्ण अवधि
होने पर उत्साह सहित उद्यापन किया।


पश्चात् एक दिन वह राजा एक बहुत बड़े बड़ के वृक्ष को जड़ से उखड़ा
हुआ देखकर वैराग्य को प्राप्त हुआ और दीक्षा लेकर अंत समय
समाधिमरण कर अपराजित नामक विमान में अहमिन्द्र हुआ और फिर
वहाँ से चयकर मिथिलापुरी में महाराजा कुंभराय के यहाँ, सुप्रभावती रानी
के गर्भ से मल्लिनाथ तीर्थकर हुए सो पंचकल्याणक को प्राप्त होकर
अनेक भव्य जीवों को मोक्षमार्ग में लगाकर आप परम धाम (मोक्ष) को
प्राप्त हुए।
इस प्रकार वैश्रवण राजा ने व्रत पालन कर स्वर्ग के, मनुष्यों के सुख को
प्राप्त कर मोक्षपद प्राप्त किया और सदा के लिए जन्म-मरणादि दुखों से
छुटकारा पाकर अविनाशी स्वाधीन सुखों को प्राप्त हुए। इसलिए जो नर-
नारी मन, वचन, काय से इस व्रत की भावना भाते हैं अर्थात् रत्नत्रय को
धारण करते हैं, वे भी राजा वैश्रवण के समान स्वर्गादि मोक्षसुख को प्राप्त होते हैं।