हस्तिनापुर महाभारत काल में कौरवों की राजधानी थी। हस्तिनापुर मेरठ
शहर से 22 मील उत्तर-पूर्व गंगा किनारे स्थित है। यूं तो उत्तर प्रदेश के
कण-कण में इतिहास बसा है। इस प्राचीनधरा पर आज भी खुदाई में त्रेता
से लेकर द्वापर युग तक के अवशेष मिलते रहते हैं। इन्हीं में से एक प्राचीन
स्थल हस्तिनापुर भी है, जो युग परिवर्तन का जीता जागता उदाहरण है।
इतिहास में दर्ज है कि हस्तिनापुर महाभारत काल में कौरवों की राजधानीथी।
हस्तिनापुर को जैन तीर्थस्थल के रूप में भी जाना जाता है। कहते हैं कि
यहां के एक जैन मंदिर में एक बड़ी पेंटिंग लगी है, जिसमें पांचों पांडवों के
साथ द्रोपदी जैन धर्म की दीक्षा लेते नजर आ रहे हैं। अगर आप भी यहां
जाएंगे तो यह पेंटिंग आपको हैरान कर सकती है। पेंटिंग देखते ही
आपकेमन सवाल आएगा कि आखिर पांडवों ने जैनधर्म कब स्वीकार किया।
जब हमने पेंटिंग को लेकर मंदिर के पुजारी से पूछा तो उन्होंने बताया कि
पांचों पांडवों ने द्रोपदी के साथ जैन धर्म स्वीकार किया था। यह उसी का
चित्रण है। उन्होंने यह भी बताया कि जैन धर्मशास्त्र के अनुसार, महाभारत
में भी जैन धर्म के 22वें तीर्थांकर थे, जिनका नाम नेमी था।
शत्रुंजय तीर्थ और हस्तिनापुर तीर्थ इन दोनों ही तीर्थों से भगवान श्री
आदिनाथ भगवान का इतिहास जुड़ा हुआ है! प्रभु के ४०० दिन भूखे
रहने के बाद पारणा, अक्षय तृतीया के दिन हस्तिनापुर में ही हुआ था!
हस्तिनापुर उत्तर प्रदेश में मेरठ के निकट स्थित महाराज हस्ती का बसाया
हुआ, एक प्राचीन नगर जो कौरवों और पांडवों की राजधानी भी रही थी!
इसका महाभारत में वर्णित अनेक घटनाओं से संबंध है! महाभारत से
जुड़ी सारी घटनाएँ हस्तिनापुर में ही हुई थीं! अभी भी यहाँ महाभारत
काल से जुड़े कुछ अवशेष मौजूद हैं, इनमें कौरवों-पांडवों के महलों और
मंदिरों के अवशेष प्रमुख हैं! इसके अलावा हस्तिनापुर को चक्रवर्ती सम्राट
भरत की भी राजधानी माना जाता है!
जैन पुराणों के अनुसार : अयोध्या नगरी की रचना देवों ने की थी, उसी
प्रकार युग के प्रारंभ में हस्तिनापुर की रचना भी देवों द्वारा की गयी थी!
अयोध्या में वर्तमान के पाँच तीर्थंकरों ने जन्म लिया, तो हस्तिनापुर को
शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरहनाथ .; इन तीन तीर्थंकरों को जन्म देने का
सौभाग्य प्राप्त हुआ है., इतना ही नहीं, इन तीनों जिनवरों के चार -चार
कल्याणक (च्यवन, जन्म, दीक्षा,केवलज्ञान) हस्तिनापुर में इन्द्रों ने
मनाए हैं ऐसा वर्णन जैन ग्रंथों में है!तीन बार यहाँ पर १५-१५ मास तक
कुबेर ने अगणित रत्नों की वृष्टि की थी, अतः रत्नगर्भा नाम से सार्थक यह
भूमि प्राणिमात्र को रत्नत्रय धारण करने की प्रेरणा प्रदान करती है! ये
तीनों तीर्थंकर चक्रवर्ती और कामदेव पदवी के धारक भी थे!
प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को एक वर्ष ३९ दिन के उपवास के
पश्चात् अक्षय तृतीया को हस्तिनापुर में ही युवराज श्रेयांस एवं राजा
सोमप्रभ ने इक्षुरस का प्रथम आहार दिया था !उस समय भी वहाँ पर देवों
द्वारा पंचाश्चर्य वृष्टि की गई थी एवं सम्राट् चक्रवर्ती भरत ने अयोध्या से
हस्तिनापुर जाकर, राजा श्रेयांस का सम्मान करके उन्हें "दानतीर्थ प्रवर्तक
की पदवी से अलंकृत किया था !हस्तिनापुर एवं उसके आसपास में इक्षु
गन्ने की हरी-भरी खेती आज भी इस बात का परिचय कराती है कि
कोड़ाकोड़ी वर्ष पूर्व भगवान के द्वारा आहार में लिया गया, गन्ने का रस
वास्तव में अक्षय हो गया है इसी प्रकार से हस्तिनापुर की पावन वसुन्धरा
पर रक्षाबन्धन कथानक, महाभारत का इतिहास, मनोवती की दर्शन
प्रतिज्ञा की प्रारम्भिक कहानी, राजा अशोक व रोहिणी का कथानक आदि
प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध हुए हैं! जिनका वर्णन प्राचीन ग्रंथों में प्राप्त होता
है और हस्तिनापुर नगरी की ऐतिहासिकता सिद्ध होती है।


