धरोहर BY JAINKART · जैन कथा संग्रह

पार्श्वनाथ भगवान
सर्प-रक्षा से केवलज्ञान तक

राजा अश्वसेन और रानी वामादेवी के पुत्र, जिनकी करुणा ने जलती हुई लकड़ी से निकले सर्प को जीवन दिया : और जिनकी अडिग साधना ने समवसरण को उजागर किया।

📖 जैन कथा संग्रह ⏱ 12–15 मिनट पठन 🕉 23वें तीर्थंकर 📅 2 अप्रैल 2026

पार्श्वनाथ भगवान जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर हैं। उनकी करुणा, संयम और चतुर्याम-व्रत परंपरा ने भगवान महावीर के युग तक जैन साधना को जीवित और प्रवाहमान रखा। उनकी कथा जन्म से मोक्ष तक अहिंसा का एक जीवंत आख्यान है।

क्रम23वें तीर्थंकर
प्रतीक-चिह्नसर्प-छत्र
वर्णनीलवर्ण (श्याम)
जन्म-स्थानवाराणसी
मोक्ष-स्थानशिखरजी
व्रत-परंपराचतुर्याम (4 व्रत)

वाराणसी में जन्म : राजकुल और प्रारंभिक जीवन

जैन आगम-ग्रंथों के अनुसार पार्श्वनाथ भगवान का जन्म वाराणसी में पौष कृष्ण एकादशी के दिन हुआ। उनके पिता राजा अश्वसेन काशी-नरेश थे और माता रानी वामादेवी थीं। जन्म के समय माता ने चौदह महास्वप्न देखे जो एक तीर्थंकर के अवतरण के शुभ संकेत माने जाते हैं।

पार्श्वकुमार बचपन से ही असाधारण थे। राजप्रासाद के सभी सुख-वैभव में रहते हुए भी उनका मन संसार की नश्वरता को जानता था। जैन ग्रंथों में उनके तेज, धैर्य और स्वाभाविक अहिंसा-प्रवृत्ति का विस्तृत वर्णन मिलता है।

पूर्व-जन्म और कमठ से वैर की श्रृंखला

जैन परंपरा में पार्श्वनाथ भगवान के पूर्वजन्मों की विस्तृत श्रृंखला मिलती है। सर्वाधिक प्रसिद्ध पूर्वजन्म में वे मरुभूति नामक राजसेवक थे और कमठ उनका बड़ा भाई। कमठ ने ईर्ष्यावश मरुभूति की हत्या की : इसी कर्म-बंध ने जन्म-जन्मांतर तक संघर्ष जारी रखा।

यह वैर-श्रृंखला केवल शत्रुता की कथा नहीं : यह जैन दर्शन का वह गहन सूत्र है जो दर्शाता है कि कर्म किस प्रकार जीव को बाँधते हैं और करुणा किस प्रकार उस बंधन को तोड़ती है।

जन्मपार्श्वनाथ के रूप मेंकमठ के रूप मेंप्रमुख घटना
मरुभूति (मंत्री)कमठ (भाई)कमठ ने मरुभूति को पत्थर से मारा
हाथीसर्पसर्प ने हाथी को डसा
स्वर्गदेवनरक-जीवपुण्य-पाप का फल भोगा
राजा अरविंदभीलभील ने राजा पर प्रहार किया
वज्रघोष (मुनि)शंबर (देव)शंबर ने मुनि पर उपसर्ग किया
पार्श्वनाथ (तीर्थंकर)मेघमाली (देव)घोर उपसर्ग : पर ध्यान अटल रहा

जलती लकड़ी और सर्प-रक्षा का अमर प्रसंग

पार्श्वकुमार एक यज्ञ-स्थल से गुज़रे जहाँ तपस्वी कमठ हवन कर रहा था। अपनी अलौकिक दृष्टि से उन्हें दिखा कि जलती लकड़ी के भीतर एक नाग-नागिन का जोड़ा जीवित है : वे धीरे-धीरे जल रहे हैं।

पार्श्वकुमार ने तत्काल लकड़ी फड़वाई। नाग-नागिन अधजले निकले। उन्होंने दोनों के कानों में णमोकार मंत्र सुनाया। दोनों प्राणी मंत्र-स्मरण के साथ देह छोड़कर धरणेंद्र और पद्मावती के रूप में देवलोक में उत्पन्न हुए।

"जो प्राणी मृत्यु की देहरी पर भी धर्म का स्मरण कर सके, वह मोक्ष का अधिकारी है।"

: पार्श्वनाथ परंपरा का सार, जैन आगम-ग्रंथ

वैराग्य और दीक्षा

30 वर्ष की आयु में पार्श्वकुमार ने संसार-त्याग का संकल्प लिया। वाराणसी के आम्रवन में पौष कृष्ण एकादशी को केशलुंचन कर दीक्षा ग्रहण की। दिगंबर और श्वेतांबर दोनों परंपराओं में यह दीक्षा-तिथि समान रूप से मान्य है।

दीक्षा के बाद साधना के पाँच प्रमुख पड़ाव

केशलुंचन और दीक्षा

वाराणसी के आम्रवन में राज-वस्त्रों का परित्याग और घोर तपस्या का अटल संकल्प।

83 दिन की कठोर साधना

ध्यान, उपवास और अहिंसा-पालन के साथ वन-वन विहार। किसी उकसावे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं।

मेघमाली का घोर उपसर्ग

कमठ के जीव मेघमाली ने भारी तूफान, बाढ़ और पत्थरों की वर्षा से उपसर्ग किया। पार्श्वनाथ अविचल रहे।

धरणेंद्र-पद्मावती की रक्षा

वही नाग-युगल जिसे बचाया था, धरणेंद्र-पद्मावती बनकर आए और सर्प-छत्र से रक्षा की।

केवलज्ञान की प्राप्ति

चैत्र कृष्ण चतुर्थी को अहिच्छत्र के निकट वटवृक्ष के नीचे केवलज्ञान का उदय।

मेघमाली का उपसर्ग और धरणेंद्र की अमर रक्षा

जब पार्श्वनाथ गहरे ध्यान में थे, मेघमाली देव ने घोर तूफान उठाया। पत्थरों और जल की भारी वर्षा हुई : पर पार्श्वनाथ का ध्यान तनिक भी नहीं टूटा।

उसी क्षण धरणेंद्र अपनी पत्नी पद्मावती सहित प्रकट हुए। धरणेंद्र ने अपने विशाल फन का छत्र बनाकर पार्श्वनाथ को सुरक्षित रखा। मेघमाली पराजित हुआ : करुणा का फल करुणा ही होता है।

🐍 धरणेंद्र और पद्मावती : भक्ति का जीवंत प्रमाण

जैन परंपरा में धरणेंद्र और पद्मावती पार्श्वनाथ के शासन-देव और शासन-देवी माने जाते हैं। इनकी पूजा जैन मंदिरों में पार्श्वनाथ मूर्ति के साथ होती है। यह कथा सिखाती है: जिसे हमने करुणा दी, वही हमारा कवच बनता है।

पद्मावती को जैन परंपरा में लक्ष्मी-स्वरूपा देवी के रूप में पूजा जाता है और उनकी स्वतंत्र उपासना-पद्धति भी प्रचलित है।

केवलज्ञान और समवसरण

दीक्षा के 83वें दिन, चैत्र कृष्ण चतुर्थी को अहिच्छत्र के निकट एक वटवृक्ष के नीचे पार्श्वनाथ भगवान को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। समवसरण की स्थापना हुई जहाँ देव, मनुष्य और पशु सभी ने एक साथ उनके उपदेश सुने।

उनका उपदेश था चतुर्याम धर्म : अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह। महावीर स्वामी ने बाद में इसमें ब्रह्मचर्य जोड़कर पंचमहाव्रत की रचना की।

मोक्ष : शिखरजी पर परम-विराम

70 वर्ष की आयु पूर्ण करते हुए, श्रावण शुक्ल अष्टमी के दिन पार्श्वनाथ भगवान ने झारखंड के शिखरजी (पारसनाथ पर्वत) पर मोक्ष प्राप्त किया।

⛰ शिखरजी : जैन धर्म का सर्वोच्च सिद्धक्षेत्र

  • झारखंड के गिरिडीह जिले में, समुद्र तल से 1365 मीटर ऊँचा
  • यहाँ 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया : इसीलिए "सिद्धक्षेत्र" कहलाता है
  • पार्श्वनाथ के नाम पर इसे "पारसनाथ हिल" भी कहते हैं
  • पर्वत पर 24 टोंक (शिखर) हैं, प्रत्येक एक तीर्थंकर को समर्पित
  • श्रावण शुक्ल अष्टमी को यहाँ मोक्ष-कल्याणक महोत्सव मनाया जाता है
  • दिगंबर और श्वेतांबर दोनों संप्रदायों में समान रूप से पवित्र
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इस जीवन से छह दीप्तिमान संदेश

करुणा चक्र बनाती है

जिस सर्प को बचाया, उसी ने तूफान में रक्षा की। करुणा कभी व्यर्थ नहीं जाती।

कर्म का बंधन अनंत है

कमठ और पार्श्वनाथ का वैर नौ जन्मों तक चला : जैन कर्म-सिद्धांत का जीवंत प्रमाण।

मृत्यु के क्षण में धर्म-स्मरण

अधजले नाग को णमोकार मंत्र सुनाया और वे देवलोक गए। अंतिम क्षण की चेतना ही अगला जन्म तय करती है।

उपसर्ग में समता

मेघमाली के घोर तूफान में भी पार्श्वनाथ अडिग रहे। बाहरी संकट भीतर की शांति नहीं तोड़ सके।

चतुर्याम : सरल पर गहन मार्ग

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह : यह मार्ग आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

महावीर की नींव

महावीर की माता त्रिशला पार्श्वनाथ की परंपरा की अनुयायी थीं। परंपरा की निरंतरता यहीं से है।

📿 मुख्य सार

पार्श्वनाथ भगवान की कथा उस सत्य का आख्यान है कि करुणा जन्म-जन्मांतर में भी फल देती है, कर्म का बोझ साधना से हल्का होता है और एक अडिग ध्यानी के सामने संसार की कोई भी शक्ति टिक नहीं सकती। उनका सर्प-छत्र उस सत्य का स्मारक है : जिसे हमने करुणा दी, वही हमारा कवच बनता है।

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स्रोत एवं संदर्भ सूची

सभी तथ्य प्रमाणिक जैन शास्त्रों और विश्वसनीय संस्थानों पर आधारित हैं।
EncyclopediaBritannica : Parshvanatha

जन्म, दीक्षा, चतुर्याम और ऐतिहासिक प्रामाणिकता।

WikipediaWikipedia : Pārśvanātha

केवलज्ञान, शिखरजी और महावीर से संबंध।

Digambar Jain WikiDigJainWiki : Parshvanath

दिगंबर परंपरा, उपासना और मेघमाली उपसर्ग।

Dada BhagwanDada Bhagwan : Past Lives

मरुभूति-कमठ पूर्वजन्म कथा का विस्तृत विवरण।

Encyclopedia of JainismEncyclopedia of Jainism

सर्प-रक्षा, णमोकार मंत्र, धरणेंद्र-पद्मावती प्रसंग।

Jain WorldJainWorld : Parshvanath

केवलज्ञान, समवसरण और मोक्ष-कल्याणक वर्णन।